♦हिमांशु शेखर♦
छत्तीसगढ़ के जंगलों में देश के जवानों का खून आखिर कबतक बहता रहेगा? सुकमा जिले के चिंतागुफा थाना क्षेत्र के बुरकापाल गांव में तीन सौ नक्सली घात लगा कर बैठे थे,लेकिन हमारी व्यवस्था को इसकी भनक तक नहीं लगी और अचानक हमले में 24 अप्रैल को हमारे 25 जवान शहीद हो गये। सभी जवान सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन के थे।
जवानों की जवाबी कार्रवाई में नक्सलियों को भी भारी नुकसान की खबर है। लेकिन शेष बचे नक्सली वारदात को अंजाम देकर भाग गये। हरबार और हमेशा ऐसा ही होता है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह कह रहे हैं- सुकमा नक्सलियों का मुख्यालय बन गया है। नक्सली अब अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि नक्सलियों के खिलाफ इस अंतिम लड़ाई के खत्म होने की तारीख कौन सी है और इसे कौन बताएगा? देश अब ऐसे वारदात को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। समय आ गया है कि इन नक्सलियों से भी ठीक उसी तरह निबटा जाना चाहिए जैसा कि सीमापार जाकर म्यांनमार के जंगलों में आतंकियों के खिलाफ भारतीय जवानों ने कार्रवाई की थी। यहां तो अपनी जमीन और अपना आसमान है, फिर नक्सलियों के खिलाफ वैसी कार्रवाई यहां असंभव क्यों? इसी सुकमा के दुर्गम भेज्जा इलाके में 11 मार्च-2017 को भी नक्सली हमले में 11 जवानों की जान गयी थी। साल 2010 में सुकमा के ताड़मेटला बीहड़ में ही 76 जवान नक्सली हमले में शहीद हुए थे। चिंता की बात यह है कि इस बार नक्सलियों ने अत्याधुनिक घातक हथियारों का इस्तेमाल जवानों पर हमले के लिए किया। गांववालों को समाने रख नक्सलियों का जवानों पर यह सीधा हमला था। बारूदी सुरंग का विस्फोट नक्सलियों ने नहीं किया था। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में देश के पूर्व विदेश मंत्री विद्याचरण शुक्ला और प्रदेश कांग्रेस के कुछ वरीय नेताओं की जान भी वर्ष 2013 में नक्सलियों के हमले गयी थी।
दूसरी ओर हमारी व्यवस्था की विडंबना देखिये! सीआरपीएफ के जवान देश की सीमा पर और देश के भीतर आतंकी-नक्सली हमले झेल रहे हैं, जवानों की ओर से इन हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है, लेकिन वह कौन सी मजबूरी है, करीब दो महीने से सीआरपीएफ में महानिदेशक का पद खाली है। सरकार ने अबतक नियमित महानिदेशक की नियुक्ति क्यों नहीं की?