♦Laharnews.com Correspondent♦
रांची: झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात तो हर मंच से नेता,मंत्री, अफसर हों या शिक्षाविद्, सभी करते हैं। लेकिन, यहां की भाषाओं के विकास की जो तस्वीर दिखाई और बतायी जाती है,दरअसल उसके पीछे की कहानी कहीं अधिक भयावह है। जिन लोगों के ऊपर बच्चों को झारखंड की भाषाओं में उच्च शिक्षा देने की जिम्मेवारी दी गयी है, वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन तो कर रहे हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों से उन्हें राशि का भुगतान नहीं किया गया है। हालात ऐसे हैं रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के अलग-अलग विभागों में अनुबंध पर नियुक्त घंटी आधारित सहायक प्राध्यापक कल से विरोध में काली पट्टी बांधकर विद्यार्थियों को पढ़ाएंगे। इस सिलसिले में खोरठा भाषा की डॉ अर्चना कुमारी, हो भाषा की डॉ सरस्वती गागराई और हो भाषा के गुरुचरण पूर्ति की ओर से रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ कामिनी कुमार को पत्र लिख कर अपनी अकथ व्यथा बतानी पड़ रही है। कुलपति को लिखे पत्र में अनुबंध पर नियुक्त घंटी आधारित इन सहायक प्राध्यापकों ने कहा कि पिछले दो वर्षों से उन्हें मानदेय का भुगतान नहीं किया गया है। इस वजह से हमारी आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक हो गयी है। सीधे-सीधे आरोप लगाया गया है कि समन्वयक कार्यालय की ओर से पिछले छह महीने से मानदेय की संचिका विश्वविद्यालय को भेजी ही नहीं गयी है। इस मामले में शिक्षकों ने असंवेदनशील रवैया अख्तियार करने का आरोप लगाया है।
रांची विवि: जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं का कैसे होगा विकास? शिक्षकों को दो वर्षों से राशि का भुगतान नहीं
